पाली । आज शिक्षक दिवस है ,इस दिवस की शुभ प्रभातवेला मैं शिक्षक होने के नाते अपने विचार आप श्रेष्ठजनों से साझा कर रहा हूं । बच्चे राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य है। उनके संस्कारो पर ही समाज व राष्ट्र का भविष्य निर्भर होता है। बच्चो के व्यक्तित्व निर्माण में शिक्षा और संस्कार की महत्ती भूमिका है। शिक्षा और संस्कार के माध्यम से मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण और विकास होता हैं। जब मनुष्य में शिक्षा और संस्कार दोनों का विकास होगा तभी वह परिवार,समाज और देश के विकास की ओर अग्रसर होगा। शिक्षा त्रि-आयामी प्रक्रिया है ,जिसमे माता-पिता और परिवार की पाठशाला के बाद शिक्षक-गुरुजनों की महत्ती भूमिका होती है।
कहते है कि “शिक्षक-गुरुजन संस्कारो का एक प्रकाश स्तम्भ है,जो विद्यार्थियों के जीवन को प्रकाशमय बनाता है।” हम शिक्षक जनो के पास जो बच्चा आता है वह कोरी स्लेट नही होता है।वह विद्यालय में दाखिला लेते समय परिवार की पाठशाला से कुछ न कुछ सीख कर जरूर आता है। हम शिक्षक जनों को चाहिए कि हम बच्चों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा देवे और उसे उत्तम जीवन जीने के वे सांस्कृतिक आदर्श मूल्य और प्रतिमानों का ज्ञान जरूर कराए जिससे वे अपने मनुज जीवन को सफल बना सके। हमारे राष्ट्र के महान स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जी ने कहा कि,”शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते है।वे संस्कारों की जड़ो में खाद देते है और अपने श्रम से सींचकर उन्हें शक्ति में निर्मित करते है।राष्ट्र के वास्तविक निर्माता उस देश के शिक्षक होते है।”
इस श्रेष्ठ विचार के मूल भाव को हम शिक्षक गुरुजनो को समझना होगा और एक विकसित,समृद्ध और खुशहाल राष्ट्र व विश्व के निर्माण में अपनी महत्ती भूमिका अदा करनी होगी।एक माली-बागवान अपने उद्यान को हरा-भरा और महकदार बनाने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ पुरुषार्थ करता है। ऐसा ही पुरुषार्थ हर शिक्षक-गुरुजन अपने विद्यालय रूपी उद्यान को पुष्पित-पल्वित करने के लिए करे तो अपना भारत गौरवमयी स्थान पर पुनः प्रतिस्थापित हो सकता है ।बच्चो को भारतीय संस्कृति के महान आदर्शो,मूल्यों और प्रतिमानों की सीख देने पर जोर देने की आवश्यकता है। हम बच्चों को सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति कर्तव्य पालन का बोध कराने की सीख देवे। हम शिक्षक-गुरुजनों गुरुत्तर दायित्व बनता है बच्चों को आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करे।
बच्चो को अपनी महान संस्कृति,सभ्यता और परम्पराओ के प्रति गौरव बोध का भाव भरे।हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई ऐसा शिक्षक-गुरुजन जरूर होता है जिसके व्यक्तित्व और विचारो की गहन छाप उस पर पड़ती है। अतः प्रत्येक शिक्षक-गुरुजन सभ्य समाज और समृद्ध राष्ट्र के निर्माण में अपने उत्तरदायित्व एवं कर्तव्य का निर्वहन पूर्ण ईमानदारी और निष्ठा से करे।