मैं और मेरे सौ साथी अपनी मस्ती में काम कर रहे हैं. हम इतने स्वार्थी तो हैं, कि थोड़ी वाह वाही मिलती रहे पर हमारा अभी कोई लम्बा प्लान नहीं है. हमें नहीं पता कि वर्ष 2023 के विधानसभा चुनावों तक क्या होगा. हम उसके लिए इतना लालायित भी नहीं हैं.
हमें यह मालूम है कि अगले तीन वर्षों में पता नहीं क्या क्या हो जाएगा…हो सकता है, कोई एक घटना ही हमारे सारे कामों पर पानी फेर दे. तमाशा पसंद जनता का कोई भरोसा नहीं है. अभी अधिकतर को अपने परिवार से ज्यादा चिंता अपनी जाति या सम्प्रदाय की है. साथ ही लोकतंत्र की भाषा और भाव अभी बहुत कम विकसित हुए हैं..
वर्ष 2018 में हमारे रिश्तेदारों और फेसबुक साथियों ने भी वोट नहीं दिया था…वे भी हमारे चक्कर में अपना वोट खराब नहीं करना चाहते थे ! फिर भी पचास हजार लोगों ने हमारा निशान ढूंढकर वोट किया. उन पचास हजार लोगों के अहसान है, उतारना है. उनको बताना है कि बिना एक विधानसभा सीट के भी हम उनके परिवारों के लिए कुछ स्थाई समाधान निकल देंगे. फिर फायदा भले सम्पूर्ण राजस्थान को हो.
इसलिए हम अभी छः महीनों की योजना पर काम कर रहे हैं. पन्द्रह मुद्दों पर काम करने का आनंद ले रहे हैं.
हमारी तुलना आप बड़े बड़े राजनेताओं से मत करियेगा, उनकी पहुँच और साधनों के सामने हम कुछ भी नहीं हैं. और हमारा रास्ता भी अलग है. हमें उनसे कोई शिकायत भी नहीं है, हम तो नई व्यवस्था की स्थापना में लगे हैं. किसी व्यक्ति विशेष की निंदा का समय नहीं है और न मन है.
हम केवल पौधे लगाने का सुकून ले रहे हैं. फल खाने का लोभ इसलिए नहीं है क्योंकि वह समय तय करता है. उस टेंशन में पौधे न लगाएं, यह नहीं होना चाहिए.
हमें पता है कि जिस अरुणा राय ने अपने कुछ साथियों के दम पर भारत के आम नागरिक को ख़ास बना दिया, ऑफिस में घुसने और कागज़ लेने का अधिकार दिलवा दिया, उनको आज जीवित होते हुए भी राजस्थान के लोग कितना मान देते हैं. न ही बड़ी संख्या में लोगों ने उनके अभियान में भाग लिया था. सूचना के अधिकार को अधिकतर केवल लोग अपने स्वार्थ के लिए काम में लेते हैं पर अरुणा जी के लिए उनके मन में श्रद्धा नहीं है. बल्कि कई गुलाम मानसिकता वाले डेढ़ होशियार लोग तो उनकी विचारधारा का मजाक उड़ाते हैं.
हम सड़कों पर नहीं उतरेंगे, ज्ञापन नहीं देंगे. हमें अपने आसपास भीड़ खड़ी करने में कोई रुचि नहीं है. हमें तो केवल जागरूक और जिम्मेदार नागरिकों से बात करनी है. उनको संगठित करना है. दिमाग-कागज-कलम -सोशल मीडिया-क़ानून-नियम के दम पर काम करना है.
सोशल मीडिया हमारा सबसे बड़ा सहारा है. हमारे आलोचक कहते भी हैं कि हम केवल फेसबुक तक सीमित है ! धरातल पर रोज दिखाई देने के लिए खूब पैसा चाहिए, झूठ-झांसे जरूरी हैं, सस्ती लोकप्रियता के मुद्दों में भीड़ के साथ चलना होता है, भले बात गलत हो…..यह हम नहीं कर पायेंगे.
अगर आप हमारी सफलता को लाखों की भीड़ या हा हू करने वाले समर्थकों के रूप में देखना चाहते हैं तो हम आपको निराश करेंगे. आप हमारे साथ अपना समय, ऊर्जा या ध्यान व्यर्थ न करें.
हम किसानों, पशुपालकों, हाथ कारीगरों, युवाओं, गायों, प्रकृति और समाज-संस्कृति के हित में अपनी लोकनीति से जितना बनेगा, काम करते रहेंगे. कुछ नहीं करने से अच्छा है, कुछ किया जाए. बात ही सही. विचार कभी व्यर्थ नहीं जाते हैं.
पुनश्च– फिर हम यह सब क्यों कर रहे हैं ? क्या निस्वार्थ भाव से कर रहे हैं ? ना जी. वाहवाही के लोभ में. प्रशंसा के चक्कर में. उससे मन बहला रहता है. दिन कट जाते हैं.
हमारी पार्टी रजिस्टर्ड है और जिस उद्देश्य से है, वह काम हो रहा है…लोकतंत्र और जनहित की बातें करना. अभी हम मात्र सौ सक्रिय साथी हैं. नए जोड़ने से बचते हैं, क्योंकि वे यहाँ चमत्कार नहीं देखेंगे तो भाग जायेंगे, निराश हो जायेंगे ! पर ये सौ साथी मंजे हुए हैं, धूप छाँव में साथ रहने वाले हैं.
इसलिए चुनाव जीतना अभी हमारे बस में नहीं है…वह खेल अलग है….उसके लिए खिलाड़ी मिल जायेंगे तो वह भी हो जाएगा. नहीं तो राम-राम, सलाम में बुराई नहीं है.
अभिनव अशोक,
अभिनव राजस्थान पार्टी